क्या आप जानते हैं मरुस्थल में जो स्थलाकृतियां हम देखते हैं वह वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृतियां होती है। यानी वे Aeolian landforms होती है। हम अपने आसपास के भू दृश्यों को रोज देखते हैं । क्या वह एक जैसे हैं, बिल्कुल नहीं । भू सतह पर कहीं गड्ढे हैं तो कहीं ऊंचे पहाड़ और पर्वत भी है । कहीं पर समतल मैदान मिलते हैं तो कहीं पर मरुस्थलीय टीले और कहीं पर पठार । यह सभी भू दृश्य पृथ्वी की आंतरिक और बाह्य शक्तियों का परिणाम है । आंतरिक शक्तियां वे शक्तियां हैं जो पृथ्वी पर पर्वत, पठार, खाई आदि भू दृश्य निर्मित करती है । लेकिन बाह्य शक्तियां वह शक्तियां हैं जो इनको समाप्त कर एक समतल मैदान में रूपांतरित करती है । इन बाह्य शक्तियों में वायु, सागरीय तरंगे, बहता जल, भूमिगत जल, हिमानी आदि को सम्मिलित किया जाता है । पृथ्वी की सतह को आकार देने वाले प्राकृतिक कारकों में वायु (Wind) एक अत्यंत शक्तिशाली और गतिशील कारक है। विशेष रूप से शुष्क (Arid) और अर्ध-शुष्क (Semi-arid) क्षेत्रों, जैसे विशाल मरुस्थलों में, वायु अपनी अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition) की शक्तियों के माध्यम से अद्भुत भू-आकृतियों का निर्माण करती है।आज के इस लेख में हम भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के इसी रोचक पहलू को समझेंगे और जानेंगे कि पवन किस प्रकार मरुस्थलीय परिदृश्य को अपनी कलाकारी से बदल देती है।
Aeolian landforms को बनाने के लिए वायु के कार्य और उन्हें प्रभावित करने वाले तत्व –
वायु द्वारा अपरदन व निक्षेपण दोनों तरह के कार्य किए जाते हैं । लेकिन यह कार्य किस प्रकार किए जाते हैं और इन्हें प्रभावित करने वाली दशाएं कौन सी होती है आईए जानते हैं ।
वायु के अपरदनात्मक कार्य –
अपघर्षण – जब वायु अत्यंत तीव्र गति से बहती है तो इसके साथ बहते हुए कंकड़-पत्थर, बालू के कण, धूल आदि वायु के साथ अपरदन क्रिया में औजार की तरह कार्य करते हैं । यह मार्ग में अवस्थित चट्टानों व मिट्टियों के जमे हुए टीलों को अपने साथ लाई हुई रेत के कण की सहायता से रगड़- रगड़ कर तथा बार-बार टकराकर इन्हें ख़रोंच डालते हैं । रेत कणों से युक्त पवन चट्टानों को इस तरह से घिसता तथा कुरेदता है की पहाड़ी तथा ऊंचे टीले वाले भाग घिस जाते हैं ।
सन्निघर्षण – तीव्र गति से बहने वाली वायु के साथ उड़ने वाले चट्टानों के कण तथा रेत कण आपस में टकराकर अथवा रगड़ खाकर टूटते-फूटते रहते हैं । इस क्रम में साथ बहने वाले कणों का आकार छोटा तथा गोल होने लगता है और इस क्रिया को सन्निघर्षण कहते हैं ।
अपवाहन – इस कार्य के अंतर्गत पवन चट्टान के कणों को उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है । अतः आधार शैल तथा मार्ग में पङने वाली चट्टानों में जगह-जगह छिद्र हो जाते हैं तथा कहीं-कहीं गर्त भी बन जाते हैं । मिश्र का कतारा गर्त काफी प्रसिद्ध है ।
वायु के कार्य को प्रभावित करने वाली दशाएं –
पवन वेग – वायु की गति अपरदनात्मक कार्य को अधिक गति प्रदान करती है, क्योंकि इसके साथ अधिक मात्रा में बालू के कण रेत आदि चलते हैं जो चट्टानों को घिसने का कार्य करते हैं ।
रेत तथा धूल कणों की मात्रा तथा स्वभाव – अधिक वेगवती वायु के साथ अपरदन की सामग्री भी अधिक होती है । लेकिन ऊंचाई के आधार पर पदार्थ की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है । पवन के निचले स्तर अर्थात धरातलीय सतह के पास रेत तथा धूलकण न केवल अधिक मात्रा में होते हैं बल्कि उनका आकार भी बड़ा होता है । ऊंचाई बढ़ने पर मात्रा में कमी तथा आकार में भी कमी होने लगती है । यही कारण है कि अपरदन का प्रभाव पहाड़ी के निचले भागों में अधिक दिखाई देता है ।
चट्टानों की संख्या – अर्द्धमरुस्थल तथा मरुस्थल के क्षेत्रों में ही वायु द्वारा निर्मित आकृति पाई जाती है । इन भागों में वायु के साथ बहने वाले कणों में क्वार्ट्ज के कारण होते हैं जो अधिक कठोर तथा तीव्र ढाल वाले होते हैं । यह कण मुलायम चट्टानों को बहुत तेजी से काट देते हैं ।
जलवायु की दशा – कठोर चट्टानों में तापमान का परिवर्तन तथा ओस का होना स्थलाकृति विकास में सहायक होता है । कठोर चट्टानें तापमान में विषमता के कारण फैलती तथा सिकुड़ती है और चट्टानों में दरारें उत्पन्न हो जाती है । इन दरारों में ओस कण जम जाते हैं और चट्टानों के आयतन में वृद्धि हो जाती है । इससे चट्टानों की दरारें फैल जाती है इस क्रिया में चट्टानें टूटने भी लगती है ।
अपरदन से निर्मित Aeolian landforms –
अर्ध शुष्क तथा शुष्क प्रदेशों में वायु द्वारा निर्मित अपरदनात्मक स्थल रूप (Erosional Landforms) निम्न है –
वात गर्त/अपवाह बेसिन(Deflation Hollows) – धरातल पर कोमल तथा असंगठित चट्टानों से निर्मित क्षेत्र के कणों को वायु अपने वेग के साथ उड़ा ले जाती है । इस तरह बार-बार वायु के प्रहार से पहले छोटे तथा बाद में बड़े व गहरे गर्तों का निर्माण हो जाता है, इन्हें ही वात गर्त कहा जाता है । यह मुख्य रूप से सहारा, कालाहारी, मंगोलिया तथा यू एस ए के पश्चिमी शुष्क प्रदेशों में पाए जाते हैं ।
छत्रक शिला/गारा ((Mushroom Rock) – इस तरह की आकृतियों का निर्माण पहाड़ के निचले भाग में अधिक कटाव तथा ऊपरी भाग में कम कटाव से होता है । फलत: ऊपरी भाग छतरी नुमा दिखाई देता है। इन्हें भी Pilzfelsan कहा जाता है ।

ज्यूजेन – जब कठोर तथा मुलायम चट्टानों की परतें एक दूसरे के समानांतर होती है तो अपक्षय व अपरदन द्वारा विभिन्न स्थल रूपों का निर्माण होता है जो ढक्कनदार दवात के समान होते हैं । इनका ऊपरी भाग कम चौड़ा होता है व कठोर चट्टान से बना होता है । इस तरह की आकृतियां कोलोराडो पठार, पेंटागोनिया पठार तथा कालाहारी क्षेत्र में पाई जाती है ।
इंसेलबर्ग – मरुस्थल में कोमल चट्टानें आसानी से कट जाती है तथा कठोर चट्टानों के अवशेष भाग ऊंचे ऊंचे टीलों के रूप में बच जाते हैं, इन्हें इंसलबर्ग कहा जाता है । सर्वप्रथम इनका अध्ययन बाॅर्नहार्ट नामक विद्वान ने किया था ।

भू स्तंभ – जब कोमल तथा असंगठित चट्टानों के ऊपर अधिक कठोर तथा प्रतिरोधी चट्टाने पाई जाती है तो भू स्तंभ का निर्माण होता है ।

यारडांग (Yardang) – इसका निर्माण ज्यूजेन के विपरीत होता है । जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लंबवत दिशा में मिलते हैं तो वायु मुलायम चट्टानों को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है और कठोर चट्टानों के भाग खड़े रह जाते हैं । इन चट्टानों के पार्श्व में पवन द्वारा कटाव होने से नालियां बन जाती है और इस स्थल रूप को यारडांग कहा जाता है ।

ड्राईकाण्टर – पथरीले मरुस्थलों में सतह पर पड़े शिलाखंडो पर पवन के अपरदन द्वारा ख़रोंच पड़ जाते हैं और शिलाखंड के टुकड़ों पर तरह-तरह की नक्काशी हो जाती है और इनकी आकृति चतुष्फलक हो जाती है ।
जालीदार शिला – जब चट्टानों की संरचना में अधिक विषमता पाई जाती है तो इनमें वायु द्वारा अपरदन भी भिन्न अनुपात में होता है । अतः चट्टानों में धीरे-धीरे छिद्र निकल आते हैं जो जाली युक्त दिखाई देते हैं ।
निक्षेपण द्वारा निर्मित Aeolian landforms –
निक्षेपणात्मक स्थल रूप – जब वायु का वेग कम हो जाता है तो वह अपने साथ लाए पदार्थों का किसी जगह पर निक्षेपण या जमाव कर देती है । इससे बने स्थल रूप निम्न है –
बालुका स्तूप (Sand Dunes) – यह बालू या रेत के एक स्थान पर एकत्रित होने से बनता है और यह भिन्न आकृतियों में निर्मित होता है । इसका निर्माण बालू या रेत की अधिकता, वायु की दिशा और वेग, वायु के मार्ग अवरोध तथा बालू जमाव के स्थान पर निर्भर करता है । अधिकांश बालुका स्तूप मुख्य मरुस्थलों जैसे कालाहारी, सहारा, थार आदि में पाए जाते हैं ।
बालुका स्तूपों के प्रकार –
स्थिति तथा संरचना के आधार पर –

सागर तटीय बालुका स्तूप – यह सागर तट के आसपास पाए जाते हैं । बेल्जियम तथा हॉलैंड के तट पर तथा भारत के पूर्वी तट पर ऐसे बालुका स्तूप देखे जा सकते हैं ।
झील तटीय बालुका स्तूप – सुपीरियर तथा मिशिगन झील के किनारे इस प्रकार के स्तूप है परंतु आर्द्र एवं नम जलवायु के कारण उस पर वनस्पति निकल आती है ।
मरुस्थलीय बालुका स्तूप – बड़े-बड़े तथा पर्याप्त संख्या में बालुका स्तूप मरुस्थल में ही पाए जाते हैं । अरब प्रदेश में सबसे अधिक बालुका स्तूप मिलते हैं । इसके अलावा एशिया महाद्वीप में सीरिया, थार मरुस्थल, मंगोलिया, ईरान आदि में भी पर्याप्त संख्या में स्तूप देखने को मिलते हैं ।
नदी तटीय बालुका स्तूप – शुष्क तथा अर्ध शुष्क प्रदेशों में बहने वाली नदियों के घाटी किनारो पर यह स्तूप पाए जाते हैं । दक्षिणी फ्रांस तथा स्पेन में अत्यधिक स्तूप मिलते हैं ।
आकार के आधार पर बालुका स्तूप –
अनुप्रस्थ बालुका स्तूप – यह मंद पवन द्वारा पवन की दिशा के समकोण पर बनते हैं ।
पवनानुवर्ती/अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप – यह पवनों की दिशा में उसके समानांतर निर्मित रैखिक कटक के आकार के स्तूप होते हैं तथा लंबाई में सैकड़ो किलोमीटर तक लंबे होते हैं । इनके बीच में बालुका मुक्त कॉरिडोर कारवां के लिए रास्ता होता है । सहारा में इसे गासी कहते हैं ।
परवलयिक बालुका स्तूप – यह आंशिक रूप से स्थाई रेतीले भागों में विकसित होते हैं। यह बरखान की तुलना में अधिक लंबे तथा संकरे होते हैं ।
बरखान स्तूप – यह विशिष्ट प्रकार के अनुप्रस्थ बालुका स्तूप होते हैं जिनका आकार चापाकार या अर्धचंद्राकार होता है। इनका निर्माण पवन की दिशा के समकोण पर होता है परंतु इनके शिखर या सींग वायु की दिशा के समानांतर होते हैं। यह श्रृंखला में पाए जाते हैं ।
सीफ बालुका स्तूप – यह तलवार या आरी के दांतों की तरह लंबे होते हैं । इनका एक सींग अधिक लंबा होता है ।
तारानुमा बालुका स्तूप – जब पवन एक तरफ से ना आकर चारों तरफ से आ रही हो तो इन स्तूपों का निर्माण होता है ।
लोयस – बारीक धूल और रेत के जमे हुए बहुत बड़े आकार के टीले लॉयस कहलाते हैं । उदा – चीन का लोयस मैदान।
निष्कर्ष –
संक्षेप में, मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायु (पवन) केवल एक प्राकृतिक कारक नहीं, बल्कि एक कुशल कलाकार के रूप में कार्य करती है।आज हमने जिन विभिन्न भू-आकृतियों के बारे में जाना—चाहे वे पवन द्वारा तराशी गई रहस्यमयी ‘छत्रक शैल’ (Mushroom Rocks) हों या हवा के रुख के साथ बदलते ‘बालुका स्तूप’ (Sand Dunes)—वे सभी यह दर्शाते हैं कि प्रकृति निरंतर गतिशील है।यह समझना न केवल भूगोल के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Desert Ecosystem) को समझने और उसके संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। हम आशा करते हैं कि यह लेख आपको पवन-निर्मित स्थलाकृतियों की दुनिया से रूबरू कराने में सफल रहा होगा।
क्या आपने कभी इनमें से किसी स्थलाकृति को वास्तविक जीवन में देखा है? अपने अनुभव कमेंट में साझा करें।

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