Volcano जो पृथ्वी के सुरक्षा वाल्व की तरह कार्य करते हैं जानिए पूरा सच

Volcano: क्या सच में ज्वालामुखी पृथ्वी के सुरक्षा वाल्व की तरह काम करते हैं?

प्रकृति जितनी शांत दिखती है, उसके भीतर उतनी ही हलचल और ऊर्जा समाहित है।क्या आप जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे हजारों किलोमीटर गहराई में एक उबलती हुई दुनिया है? ज्वालामुखी ( Volcano )केवल ‘आग उगलने वाले पहाड़’ नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी के सुरक्षा वाल्व (Safety Valves) की तरह काम करते हैं।भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) में ज्वालामुखी एक अत्यंत महत्वपूर्ण ‘आकस्मिक घटना’ (Sudden Process) मानी जाती है। पृथ्वी के आंतरिक भाग में अत्यधिक ताप और दाब के कारण जब चट्टानें पिघली हुई अवस्था (Magma) में ऊपर की ओर आती हैं, तो वे ज्वालामुखी के रूप में बाहर आती है और धरातल पर विभिन्न स्थलाकृतियों का निर्माण करती हैं। जब यह आग मैग्मा, गैस और राख के रूप में धरातल को चीरते हुए बाहर आती है, तो यह न केवल विनाश लाती है, बल्कि नई चट्टानों और उपजाऊ भूमि का निर्माण भी करती है। आज के इस लेख में हम ज्वालामुखी की इसी अद्भुत प्रक्रिया, इसके प्रकारों और पृथ्वी पर इसके प्रभावों को विस्तार से समझेंगे।”

आखिर क्या है Volcano –

ज्वालामुखी एक मुख यानी छिद्र होता है जिसमें से पृथ्वी के भीतर स्थित तप्त लावा, गैस, जल व चट्टानों युक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं । मैग्मा संवाहनिक धाराओं के साथ ऊपर की ओर बढ़ता है तथा पृथ्वी की कमजोर पपड़ी को तोड़कर बाहर निकल जाता है ।

पृथ्वी के अंदर मैग्मा व गैस के उत्पन्न होने से लेकर भूपटल पर लावा निकलने व उसके ठंडा होकर जमने तक की प्रक्रियाएं ज्वालामुखीयता कहलाती है ।

ज्वालामुखी संरचना

ज्वालामुखी से संबंधित कुछ शब्द व उनके अर्थ निम्न प्रकार है –

क्रेटर – वह छिद्र जिसमें से लावा बाहर निकलता है । कालांतर में इसमें पानी भर जाने से क्रेटर झील बन जाती है । सबसे बड़ी क्रेटर झील टोबा है जो उत्तरी सुमात्रा में स्थित है । भारत में स्थित क्रेटर झील लोनार ( महाराष्ट्र ) है।

काल्डेरा – जब क्रेटर तीव्र विस्फोट से उड़ जाए या बड़ा हो जाए तो वह काल्डेरा कहलाता है । सबसे बड़ा काल्डेरा आसो ( जापान ) है।

ज्वालामुखी पाइप – यह वह पाइप या नली होती है जिसमें से होकर मैग्मा पृथ्वी की सतह पर आता है ।

ज्वालामुखी शंकु – लावा के लगातार ठंडा होकर जमते रहने से बनी पर्वत या शंकुनुमा आकृति होती है ।

यदि मैग्मा में सिलिका की मात्रा ज्यादा है तो विस्फोटक उद्गार होता है लेकिन अगर सिलिका की मात्रा कम है तो शांत उद्गार होता है ।

ज्यादा जानकारी के लिए आप USGS वाल्कैनो हज़ार्डस प्रोग्राम की वेबसाईट देख सकते हैं |

ज्वालामुखी क्रैटर में पानी भरने से निर्मित क्रैटर झील

कितने प्रकार के होते हैं Volcano –

ज्वालामुखी की सक्रियता के आधार पर इन्हें तीन भागों में बांटा जाता है ।

1. मृत ज्वालामुखी – वे ज्वालामुखी जिनमें सैंकड़ों सालों से उद्गार नहीं हुआ है और भविष्य में भी उद्गार की कोई संभावना नहीं है, वह मृत ज्वालामुखी कहलाते हैं ।

उदा. – पोपा ( म्यांमार ), कोह सुल्तान, देवबंद ( ईरान ), चिंबराजो ( इक्वेडोर ), एकांकागुआ ( सबसे ऊंचा मृत ज्वालामुखी ) ( अर्जेंटीना ), किलिमंजारो ( तंजानिया ) आदि ।

2. प्रसुप्त ज्वालामुखी – वह ज्वालामुखी जिनमें दीर्घकाल से उद्भेदन नहीं हुआ है पर होने की संभावना है ।

उदा. – विसुवियस ( इटली ), फ्यूजियामा ( जापान ), क्राकाटाओ ( इंडोनेशिया ), मेयोन (फिलिपींस), नारकोंडम (भारत)

3. सक्रिय ज्वालामुखी – वे ज्वालामुखी जिनमें लगातार उद्गार हो रहा है ।

उदा. – एटना ( इटली ), स्ट्रांबोली (भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ) (इटली), बैरन (भारत), कोटोपैक्सी (इक्वेडोर), माउंट एरेबस (अंटार्कटिका), ओजोस डेल सलाडो (अर्जेंटीना-चिली सीमा)

उद्गार के आधार पर ज्वालामुखी का वर्गीकरण –

1. दरारी उद्गार ज्वालामुखी – यह ज्वालामुखी दरार या भ्रंश के सहारे निकलते हैं । इनमें गैस कम निकलती है और यह प्राय शांत होते हैं ।

2. केंद्रीय उद्गार ज्वालामुखी – इनमें लावा छिद्र से निकलता है । उद्गार के आधार पर यह चार प्रकार के होते हैं –

हवाई तुल्य – यह शांत उद्गार वाले होते हैं और लावा पतला होता है ।

स्ट्रांबोली तुल्य – इनमें उद्गार थोड़ा तीव्र होता है ।

वोल्केनो तुल्य – यह विस्फोटक व भयंकर उद्गार वाले होते हैं ।

पीलियन तुल्य – यह सर्वाधिक विस्फोटक, भयंकर व विनाशकारी होते हैं ।

Volcano जो  पृथ्वी के लिए सुरक्षा वाल्व की तरह कार्य करता है

ज्वालामुखी (Volcano) उद्गार के प्रमुख कारण –

ज्वालामुखी उद्भेदन के कई कारण होते हैं । आईए जानते हैं इन कारणों के बारे में –

  • प्लेट विवर्तनिकी – प्लेट विवर्तनिकी के बारे में हमने अपने एक लेख में विस्तार से बात की है । जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे चली जाती है तो नीचे जाने वाली प्लेट पिघलकर मैग्मा बन जाती है । यह मैग्मा इस प्लेट के किनारो के सहारे ऊपर आ जाता है । यह क्रिया विनाशी या अभिसारी प्लेट सीमांतो पर होती है । यह ज्वालामुखी विस्फोटक होते हैं । परिप्रशांत मेखला में पाए जाने वाले ज्वालामुखी इसी श्रेणी में आते हैं । इसी प्रकार रचनात्मक या अपसारी प्लेट सीमांत पर दरारी उद्गार वाले ज्वालामुखी पाए जाते हैं । महासागरीय कटकों में मिलने वाले ज्वालामुखी इन्हीं प्लेट सीमांतो वाले होते हैं ।
  • कमजोर भूपटल – ज्वालामुखी उद्गार उस स्थान पर अधिक होता है जहां पर भूपटल कमजोर होता है । कमजोर पपड़ी को तोड़ना आसान होता है । ऐसी कमजोर सतह को तोड़कर मैग्मा आसानी से ऊपर आ जाता है ।
  • गर्भ में अत्यधिक तापमान – भूगर्भ में अत्यधिक तापमान होता है । भूगर्भ में रेडियोधर्मी पदार्थों के विघटन, रासायनिक प्रक्रमों व ऊपरी दबाव के कारण अत्यधिक ताप उत्पन्न होता है जिससे चट्टानें पिघल जाती है और लावा के रूप में बाहर निकलती है ।
  • गैसों की उत्पत्ति – भूगर्भ में ताप, दाब व अन्य तत्वों के कारण गैसों के साथ जलवाष्प भी बनने लगती है । अत्यधिक जलवाष्प बनने के कारण यह बहुत अधिक दाब के साथ सतह को तोड़कर बाहर निकलती है ।

ज्वालामुखी क्रिया में निस्रत पदार्थ –

ज्वालामुखी से सूक्ष्म से लेकर बड़े तक सभी प्रकार के पदार्थ निकलते हैं । इससे ठोस, द्रव और गैस तीनों रूपों में पदार्थ निस्रत होते हैं । गैसीय पदार्थों में विभिन्न प्रकार की गैसों के साथ जलवाष्प भी सम्मिलित होती है । जलवाष्प की मात्रा 60 से 90% होती है । ज्वालामुखी से निकलने वाली प्रमुख गैसें हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बन डाई सल्फाइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, अमोनियम क्लोराइड आदि होती है ।

ठोस पदार्थों में बारीक धूलकण ( टेल्क), बड़े टुकड़े ( बम ), लैपिली ( मटर के दाने जैसे टुकड़े ), छोटे-छोटे टुकड़े ( स्कोरिया ), लावा झाग से निर्मित पदार्थ ( प्यूमिस ), छोटे-छोटे नुकीले शिलाखंड जो लावा से चिपक कर संगठित हो जाते हैं ( शंकोणाश्म ) और द्रवित चट्टानें यानी लावा भी निकलता है ।

ज्वालामुखी क्रिया से निर्मित स्थलाकृतियां –

ज्वालामुखी निर्मित स्थलाकृतियों को दो भागों में बांटा जा सकता है – बाह्य स्थलाकृतियां व अंतर्वेधी आकृतियां।

1. बाह्य स्थलाकृतियां – यह वे स्थलाकृतियां होती है जो ज्वालामुखी लावा की वजह से स्थल के ऊपर निर्मित होती है । यह निम्न प्रकार है –

सिंडर शंकु – विस्फोटिय ज्वालामुखी में राख व अंगारों के ठंडा होकर जमने से बनी शंक्वाकार आकृति सिंडर शंकु कहलाती है । यह हवाई द्वीप में ज्यादा पाए जाते हैं ।

मिश्रित शंकु – लावा व राख के बार-बार समानांतर परतों में जमने से बनते है । यह ऊंचे व बड़े होते हैं । ढलानों पर बने छोटे-छोटे शंकु परजीवी शंकु कहलाते हैं । उदा. – फ्यूजियामा (जापान), मेयन (फिलिपींस), स्ट्रांबोली (इटली)

शंकुस्थ शंकु ( शंकुओं का घोंसला ) – एक शंकु के अंदर दूसरा व कई अन्य शंकुओं के विकसित होने से बनता है । उदा. – विसुवियस (इटली)

क्षारीय लावा शंकु (लावा शील्ड) – जब लावा में सिलिका की मात्रा कम होती है तो वह अधिक तरल व पतला लावा होता है । इसके कारण इससे कम ऊंचाई व मंद ढाल वाला शंकु निर्मित होता है जो बेसाल्ट से बना होता है । उदा. – मोनालोआ (हवाई द्वीप)

अम्ल लावा शंकु या गुंबद – जब लावा में सिलिका की मात्रा ज्यादा होती है तो वह गाढा व चिपचिपा होता है । जिससे वह ज्वालामुखी से निकलते ही उसके मुख के आसपास जम जाता है । जिससे तीव्र ढाल वाले गुंबद का निर्माण होता है । उदा. – स्ट्रांबोली (इटली), पाई-डी-डोम (फ्रांस)

लावा पठार – लावा के लगातार बहने से बने पठार । उदा. – दक्कन ट्रैप (भारत), कोलंबिया पठार

ज्वालामुखी पर्वत – फ्यूजीयामा (जापान), इटली, अलास्का आदि में पाए जाते हैं ।

2. अंतर्वेधी आकृतियां – जब मैग्मा पृथ्वी की सतह के बाहर ना आकर अंदर ही जम जाता है तो उससे विभिन्न आकृतियां बन जाती है । यह निम्न प्रकार है –

ज्वालामुखी से निर्मित अंतर्वेधी आकृतियाँ

बैथोलिथ – यह अधिक गहराई में होते हैं । यह मैग्मा के जमे बड़े भंडार होते हैं । ये ग्रेनाइट के बड़े पिंड अनाच्छादन द्वारा भूपटल पर भी प्रकट हो जाते हैं ।

लैकोलिथ – यह गुंबदनुमा विशाल चट्टान होती है, जिसका तल समतल होता है व एक पाइप रूपी लावा वाहक नली से जुड़ा होता है । यह कर्नाटक के पठार में प्राप्त होते रहते हैं ।

डाइक – जब लावा दरारों में धरातल के समकोण पर दीवार की भांति खड़े रूप में जम जाता है तो उसे डाइक कहते हैं ।

सिल – जब लावा क्षैतिज तल में चादर के रूप में फैलकर जम जाता है । ( कम मोटाई होने पर – शीट)

लैपोलिथ – तस्तरी की आकृति में जमा लावा।

फैकोलिथ – मोङदार अवस्था में अपनति के ऊपर व अभिनति के तल में जमने पर ।

ज्वालामुखी का विश्व वितरण –

ज्वालामुखी का विश्व में वितरण निम्न प्रकार है –

प्रशांत महासागरीय पेटी – यह अभिसारी प्लेट सीमांत वाला क्षेत्र है जिसे रिंग ऑफ फायर या ज्वालामुखी का अग्नि वलय भी कहा जाता है ।

मध्य महाद्वीपीय पेटी

इसके अलावा अफ्रीकन रिफ्ट घाटी, अटलांटिक महासागरीय कटक व आइसलैंड आदि क्षेत्रों में भी ज्वालामुखी का वितरण पाया जाता है ।

ज्वालामुखी के लाभ –

ज्वालामुखी को प्राकृतिक सुरक्षा वाल्व कहा जाता है क्योंकि यह भूगर्भ के उच्च दाब को बाहर निकलते हैं । ज्वालामुखी से हानि तो होती ही है क्योंकि यह विनाशकारी होते हैं । सैकड़ो किलोमीटर के वन इससे नष्ट हो जाते हैं । लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं । कभी – कभी तो इसकी वजह से भूकंप भी आ जाते हैं | कृषि भूमि भी नष्ट हो जाती है । लेकिन इससे बहुत सारे लाभ भी होते हैं । आईए जानते हैं वह क्या है –

  • ज्वालामुखी लावा के ठंडा होकर जमने से रेगुर या काली मृदा पर प्राप्त होती है जो फसलों के लिए बहुत लाभदायक होती है ।
  • ज्वालामुखी चट्टानों से सोना, चांदी, तांबा व अन्य मूल्यवान खनिज प्राप्त होते हैं ।
  • इसकी अधिक ताप वाली भाप से भूतापीय ऊर्जा बनाई जाती है ।
  • इससे गर्म जल के झरने निकलते हैं । जिनका गंधक युक्त जल चर्म रोग की चिकित्सा में काम आता है ।
  • ज्वालामुखी से पृथ्वी के आंतरिक भाग की स्थिति का ज्ञान होता है ।
  • दस हजार धूम्र घाटी – यह वे पर्यटन क्षेत्र होते हैं जिनसे जलवाष्प व जल फव्वारे जैसे बाहर निकलता है ।
  • मिश्र की नील नदी शांत ज्वालामुखी विदर में जल भरने से निर्मित विक्टोरिया झील से निकलती है ।

भारत में ज्वालामुखी से संबंधित अन्य तथ्य –

भारत में ज्वालामुखी से संबंधित कुछ क्षेत्र –

बैरन द्वीप पर स्थित ज्वालामुखी भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्थित है जो भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है ।

दक्कन लावा क्षेत्र क्रिटेशियस काल में लावा के जमने से बना था ।

कुडप्पा व ग्वालियर क्षेत्र कुडप्पा काल में हुए उद्गार से बने थे ।

राजमहल व अबोर पहाड़ी क्षेत्र (असम) जुरासिक काल में हुए उद्गार से निर्मित है ।

मालानी (जोधपुर) व अरावली का उत्तरी छोर विंध्यन काल में हुए उद्गार से निर्मित है ।

डालमा क्षेत्र (झारखंड) भारत का प्राचीनतम ज्वालामुखी क्षेत्र है ।

निष्कर्षतः- ज्वालामुखी केवल विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी की भूगर्भीय संरचना और विकास का एक अभिन्न हिस्सा हैं। जहाँ एक ओर इनके फटने से जन-धन की हानि होती है, वहीं दूसरी ओर ये नई उपजाऊ मिट्टी, बहुमूल्य खनिजों और अद्भुत द्वीपों का निर्माण भी करते हैं। ज्वालामुखी हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी पृथ्वी आज भी भीतर से उतनी ही सक्रिय और ऊर्जावान है जितनी करोड़ों साल पहले थी। आज के समय में जब हम ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, ज्वालामुखी के उत्सर्जन और उनके शीतलन प्रभाव (Cooling Effect) को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।इनकी भव्यता और शक्ति हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और सतर्कता दोनों की सीख देती है।

यह लेख आपको कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ।

2 thoughts on “Volcano: क्या सच में ज्वालामुखी पृथ्वी के सुरक्षा वाल्व की तरह काम करते हैं?”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *