हमने हमारे पिछले लेख में पढ़ा था कि महाद्वीप पहले एक ही जगह एकत्रित थे और बाद में उनका विस्थापन हुआ और आज हम उन्हें एक अलग रूप में देख रहे हैं । महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को अधिक विश्वसनीय नहीं माना गया । इसलिए उसके पश्चात प्लेट विवर्तनिकी ( Plate Tectonics) सिद्धांत सामने आया। इसी सिद्धांत को अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
आईए जानते हैं कि क्या है प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत और इससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां –
क्या होता है प्लेट विवर्तनिकी ( Plate Tectonics)
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के बारे में जानने से पहले जरूरी है यह जानना कि प्लेट्स क्या होती है ?
प्लेट शब्द का नामकरण सबसे पहले टूजो विल्सन ने 1965 में किया था । प्लेट एक स्थलीय दृढ़ भूखंड होता है । यानी हमारी धरती अलग-अलग प्लेट्स में विभाजित है। यह सभी प्लेट्स मिलकर धरती को एक पूर्ण रूप प्रदान करती है। प्लेट धरती की ऊपरी सतह यानि भू पर्पटी ( क्रस्ट ) व मेंटल ( क्रस्ट के नीचे की परत ) की ऊपरी परत से मिलकर बनी होती है। इसकी मोटाई 5 से 200 किलोमीटर तक हो सकती है । प्लेट महाद्वीपीय व महासागरीय क्रस्ट से मिलकर बनी होती है। इस भाग में सिलिका, एल्युमिनियम व मैग्नीशियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। इस भाग के नीचे मेंटल का दुर्बलता मंडल स्थित होता है । ये प्लेट्स इस दुर्बलता मंडल पर संचलन करती है ।
प्लेट विवर्तनिकी – प्लेटो के एक-दूसरे के सापेक्ष संचलन से होने वाले परिवर्तन का अध्ययन ही प्लेट विवर्तनिकी कहलाता है । प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का आधार 1960 में हैरी हेस द्वारा दिया गया सागर नितल प्रसरण सिद्धांत था । विस्तृत सिद्धांत 1967 में मैकेंजी, पार्कर व मॉर्गन ने प्लेट संचलन की व्याख्या करते हुए दिया ।
Plate Tectonics सिद्धांत में बताई गई प्रमुख प्लेट्स
इस सिद्धांत में बताया गया है कि पृथ्वी बहुत सारी प्लेट्स से मिलकर बनी हुई है । इनमें कुछ प्लेट्स बड़ी तो कुछ छोटी प्लेट्स हैं। मुख्य रूप से 7 प्रमुख या बड़ी प्लेट्स हैं। जो इस प्रकार है-

- अफ्रीकी प्लेट
- यूरेशियन प्लेट
- इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट
- उत्तर अमेरिकी प्लेट
- दक्षिण अमेरिकी प्लेट
- अंटार्कटिक प्लेट
- प्रशांत महासागरीय प्लेट
इन सात मुख्य प्लेट्स के अलावा कुछ छोटी प्लेट्स भी है –
- नाज़का प्लेट – यह दक्षिण अमेरिका व प्रशांत प्लेट के मध्य स्थित है ।
- कोकोस प्लेट – यह मध्य अमेरिका व प्रशांत प्लेट के मध्य स्थित है ।
- अरेबियन प्लेट – यह सऊदी अरब वाला क्षेत्र है ।
- फिलीपीन प्लेट – यह प्लेट यूरेशियन व प्रशांत प्लेट के मध्य स्थित है।
- जुआन डी फूका प्लेट – यह प्लेट उत्तर अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित है ।
- कैरेबियन प्लेट – यह प्लेट मध्य अमेरिका के पास स्थित है ।
यह कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेट्स थीं । सबसे बड़ी प्लेट प्रशांत प्लेट है । यही एकमात्र पूर्णत महासागरीय प्लेट भी है । सबसे छोटी प्लेट जुआन डी फूका प्लेट है।
प्लेटों की गति के कारण –
प्लेट विवर्तनिकी के लिए एक चालक बल की आवश्यकता होती है । यह बल मेंटल में संवाहिक धाराओं के रूप में प्रवाहित होता रहता है । संवाहनिक धाराओं के उत्पत्ति भूगर्भ में रेडियो सक्रिय पदार्थों से निकली ऊर्जा से होती है। इन्हीं संवाहनिक धाराओं के कारण प्लेट्स में संचलन होता है । यह धाराएं भूगर्भ से सतह की ओर गमन करती है । जिससे प्लेट्स धीरे-धीरे प्रवाहित या संचालित होती रहती है ।
संवाहनिक धाराओं के कारण प्लेट्स में संचलन होता है और पृथ्वी की सतह पर कई प्रकार के परिवर्तन होते हैं ।

- जब संवाहनिक धाराएं सतह कि ओर बढ़ती है तो वह ऊपर जाते हुए एक – दूसरे से दूर हटने लगती है । अर्थात अपसरण होता है । यह कार्य प्लेटों के जिन सीमांतो पर होता है उन्हें अपसारी सीमांत कहते हैं। जिससे सागरों का निर्माण होता है और ज्वालामुखी फ़टते हैं ।
- जब संवाहनिक धाराएं सतह की ओर बढ़ते हुए एक-दूसरे के करीब आती है, तो वहां दबाव बढ़ता है व अवतलन होता है । यह अभिसारी सीमांतो पर होता है । जिससे पर्वतों का निर्माण, वलन व ज्वालामुखी संबंधी गतिविधियां होती है।

प्लेट सीमांतो के प्रकार –
सतह पर हुए परिवर्तनों को देखते हुए सीमांतो को तीन भागों में बांटा जा सकता है –
- अपसारी सीमांत – जब संवाहनिक धाराएं ऊपर की ओर बढ़ती है तो उनके साथ भूगर्भ में स्थित मैग्मा भी ऊपर की तरफ बढ़ने लगता है । यह मैग्मा पहले से उपस्थित चट्टानों को दोनों तरफ धकेल देता है और ऊपर जाकर नहीं चट्टानें बनाता है। जिससे प्लेटो के सीमांत दूर हटने या फैलने लगते हैं । इन्हें ही अपसारी सीमांत कहा जाता है । इससे महासागरीय तली का प्रसरण होता है और नई चट्टानें बनती है । इसलिए इस रचनात्मक प्लेट किनारा भी कहा जाता है । अफ्रीका की ग्रेट रिफ्ट वैली व मध्य अटलांटिक कटक इसका प्रमुख उदाहरण है ।
- अभिसारी सीमांत – जब संवाहनिक धाराएं ऊपर की तरफ जाती है तो वे एक-दूसरे की तरफ बढ़ने लगती है । इसलिए इसे अभिसारी सीमांत कहते हैं । जिससे दबाव या संपीडन की स्थिति पैदा होती है । जो प्लेट अधिक भारी होती है वह नीचे की तरफ धंसने लगती है । नीचे धंसने पर उस प्लेट का वह भाग मैग्मा व गर्मी की वजह से पिघलने लगता है और मैग्मा ऊपर आने लगता है । प्लेट का किनारा टूटने या पिघलने की वजह से इस विनाशात्मक प्लेट किनारा भी कहते हैं। इससे खाईयां ( Trenches ), ज्वालामुखी श्रंखलाएं, द्विपीय चापों का निर्माण होता है।
- परवर्ती सीमांत – जब संवाहनिक धाराएं एक दूसरे के पार्श्व में चलती है तो उसे परवर्ती सीमांत कहते हैं। यहां पर नतिलम्ब भ्रंश की उत्पत्ति होती है। इन प्लेट किनारों पर ना विनाश होता है और ना ही कोई रचना । इसलिए इसे संरक्षी प्लेट किनारा भी कहते हैं । प्रशांत व अमेरिका प्लेट के मध्य स्थित सेन एंड्रियास भ्रंश इसका अच्छा उदाहरण है ।

भूकंप व ज्वालामुखीयता का प्लेट विवर्तनिकी से संबंध
अधिकांश ज्वालामुखी व भूकंपीय क्षेत्र प्लेट सीमांतो पर पाए जाते हैं। प्लेटो की संख्या व सीमांकन में भूकंपीय क्रिया की पट्टियों का सहारा लिया जाता है । भूकंपनीयता, महासागरीय कटक, ट्रेंच, चाप, प्रमुख विभंग क्षेत्र व नवीन पर्वत पेटियां प्लेट सीमाओं की परिचायक है । अर्थात इनसे पता चलता है कि पृथ्वी पर कितनी प्लेट्स हैं और कहां पर प्लेट सीमांत है । क्योंकि यह सभी आकृतियां प्लेट सीमाओं पर पाई जाती है ।
अधिकतर भूकंप भी प्लेट सीमाओं पर आते हैं । अपसारी प्लेट सीमाओं पर छिछले केंद्रीय भूकंप क्षेत्र मौजूद होते हैं। जबकि अभिसारी प्लेट सीमाओं पर माध्यमिक व गहरे भूकंप केंद्र मौजूद होते हैं । इन्हें प्लेट सीमांतो पर ज्वालामुखी भी पाए जाते हैं । विनाशी प्लेट के ज्वालामुखी महाद्वीपीय होते हैं और यहां एण्डेसाइट चट्टानें पाई जाती है। रचनात्मक प्लेट के ज्वालामुखी महासागरीय होते हैं और यहां बेसाल्ट चट्टानें पाई जाती है।
सागर नितल प्रसरण सिद्धांत –
यह सिद्धांत हैरी हेस द्वारा 1960 में दिया गया । इस सिद्धांत का आधार था मध्य महासागरीय कटकों के समीप चुंबकीय विसंगति का पाया जाना ।
इस सिद्धांत में बताया गया है कि महासागरीय तली पर चट्टानों का उत्तर से दक्षिण दिशा में पट्टियों का क्रम पाया जाता है । अर्थात जो मध्य महासागरीय कटक होते हैं उनमें पास में स्थित चट्टानें नई होती है जबकि दूर जाने पर चट्टानें पुरानी होने लगती है । इसका मतलब है कि मध्य महासागरीय कटक मेंटल से उठने वाली संवाहनिक धाराओं के ऊपर स्थित है । जैसा कि हमने पहले जाना इन धाराओं की वजह से नए पदार्थों का निर्माण होता है। फिर वह दोनों ओर खिसक जाते हैं और नए पदार्थ फिर से ऊपर आ जाते हैं । इससे सागर के तल का लगातार प्रसरण होता रहता है ।
निष्कर्ष – हमने जाना की संवाहिक धाराओं की वजह से प्लेट्स का संचलन होता है। सभी महाद्वीप और महासागर इन्ही प्लेटों के ऊपर स्थित है । इसलिए जब इन प्लेट्स का संचलन होता है तो महाद्वीपों और महासागरों की स्थिति में भी परिवर्तन होता है । इसलिए प्राचीन समय में जब प्लेट्स में संचलन हुआ तो पेंजिया का विघटन हुआ और सभी महाद्वीप अलग-अलग टूट गए । वहां से इन प्लेट्स के साथ प्रवाहित होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया । महाद्वीपों को यहां तक पहुंचने में करोड़ों वर्षों का समय लगा है । यानी यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से होती है। हो सकता है आज से करोड़ों वर्ष बाद इन महाद्वीपों की स्थिति कुछ ओर हो ।
आपको यह लेख कैसा लगा हमें जरूर बताएं ।


Pingback: महाद्वीपीय प्रवाह ( Continental Drift ) क्या होता है ? पूरी जानकारी । - GREEN VIDYALAYA
Well explained and in detailed article. Nice and easy language. Best for students.