हमारा हिमालय बिना बर्फ़ के उदास दिख रहा है | हिमालय केवल भारत के लिये ही नहीं आस – पास के सभी देशों व पर्यावरण के लिये भी महत्वपूर्ण पर्वत श्रंखला है | हिमालय क्षेत्र में बसे लोगों की आजीविका भी इसकी बर्फ़ीली वादियों पर निर्भर है | देखा जाये तो इस क्षेत्र में कृषि, पर्यटन, व्यापार व नदियों को मिलने वाला ताज़ा पानी सभी हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं पर निर्भर है | यहाँ की खूबसूरत वादियाँ और बर्फ़ीली चोटियाँ दुनियाभर के प्रकृति प्रेमियों व एडवेंचर स्पोर्ट्स में रूचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करती रही है | लेकिन जो हालात हिमालय के वर्तमान में है, क्या वो सब कुछ बदल कर रख देंगे ? कैसे हम उदास हिमालय को फिर से बर्फ़ीला और खुश कर सकते हैं ?

पिछले कुछ सालों से हिमालय पर होने वाली बारिश और बर्फ़बारी में लगातार कमी देखी जा रही है | जो पहाड़ सर्दियों में बर्फ़ से ढके और सैलानियों से भरे होने चाहिए थे, वहाँ अभी नंगी व पथरीली चट्टानें दिखाई दे रही है | हम जानते हैं कि यह जलवायु परिवर्तन का नतीजा है | इसका प्रभाव केवल हिमालयी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी दिखाई दे रहा है | देखा जाये तो यह बहुत गंभीरता से सोचने वाला विषय है | आखिर क्यों झेल रहा है हिमालय बर्फ़ का अकाल ( snow drought ) और क्या अब हमें इस खतरे के लिये तैयार हो जाना चाहिए ? आइये जानते हैं कुछ ऐसे तथ्य जो हमें सचेत कर रहे हैं –
हिमालय पर कम बर्फ़बारी के मुख्य कारण –
कुछ सालों से हिमालय के निचले क्षेत्रों में बर्फ़बारी कम और बारिश ज्यादा हो रही है | वैज्ञानिकों की मानें तो 1980 -2020 के बीच औसत बर्फ़बारी के मुकाबले पिछले 5 सालों में सर्दियों में बहुत कम बर्फ़बारी देखने को मिली है | वैज्ञानिकों द्वारा बताये गये कुछ मुख्य कारण निम्न है –
- कमजोर व नमी रहित पश्चिमी विक्षोभ – ज्यादातर मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्दियों में भारत, पाकिस्तान व नेपाल में कम बारिश व कम बर्फ़बारी की एक बड़ी वजह है पश्चिमी विक्षोभों का कमजोर व नमी रहित होना | ( पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम होते हैं जो जेट स्ट्रीम के साथ आते हैं और अपने साथ ठंडी हवाएं लाते हैं | ये अरब सागर व बंगाल की खाड़ी से आने वाली आर्द्रता युक्त पवनों से अन्तः क्रिया करते हैं, जिससे मेघ निर्माण व बारिश होती है | ) पहले पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों में अच्छी बारिश और बर्फ़बारी लाते थे | जिससे रबी की फसलों को मदद होती थी और पहाड़ों पर बर्फ़ जमा हो जाती थी | पिछले कुछ सालों में ये विक्षोभ कमजोर हो गये हैं | इनमें कमजोर परिसंचरण के कारण विक्षोभ के ठहरने का समय व इनकी नमी ग्रहण करने की क्षमता भी कम हो गयी है | जिससे मेघ निर्माण व संघनन सीमित हो गया है | इसी वजह से हिमालय में हिमपात व बारिश कम हो गयी है | ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग में ट्रॉपिकल मेटियोरोलोजी के प्रमुख शोध फ़ेलो कीरन हंट का मानना है कि उत्तरी भारत में सर्दियों में होने वाली ज्यादातर बारिश इन्ही विक्षोभों के कारण होती है | हंट के अनुसार यहाँ दो चीजें हो रही है | एक तो पश्चिमी विक्षोभ कमजोर हो रहें हैं और दुसरा ये थोड़े -थोड़े उत्तर की ओर खिसक रहे है | जिससे जम्मू के दक्षिणी राज्यों जैसे उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में सर्दियों का तापमान बढ़ने लगा है | भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस सर्दी उत्तर भारत में आये पश्चिमी विक्षोभ कमजोर बताये गये क्योंकि मामूली बारिश और कम बर्फ़बारी हुई |
- वैश्विक तापमान में वृद्धि – तापमान में वृद्धि के कारण एक तो पहले ही बर्फ़ कम गिरती है, फिर थोड़ी बहुत जो बर्फ़ गिरती है वह जल्दी पिघल जाती है | तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय के निचले इलाकों में बर्फ़ कम गिरती है और बारिश ज्यादा होती है |
- इंटरगवर्नमेंटरल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज और अन्य वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय पर बर्फ़ कम गिर रही है |
- जेट स्ट्रीम का बदलता पैटर्न – जेट स्ट्रीम वे हवाएं होती है जो सर्दियों में भूमध्य सागर से हिमालय की ओर आती है और साथ में नमी लाती है | पिछले कुछ सालों में इनके पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिला है | ये अब कमजोर हो गयी है और उत्तर की ओर खिसक रही है |

हिमालय में कम बर्फ़बारी के प्रभाव जो वर्तमान में देखने को मिल रहे हैं और भविष्य में देखने को मिलेंगे –
वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में कम बर्फ़बारी से ना केवल हिमालय का स्वरुप बदलेगा बल्कि इस क्षेत्र के करोड़ों लोगों के जीवन और कई इकोसिस्टम पर भी इसका असर पड़ेगा | स्नो ड्रोट की वजह से देखे जाने वाले कुछ प्रभाव निम्न है –
- जल की कमी – बसंत में तापमान में वृद्धि की वजह से सर्दियों की जमा बर्फ़ का पानी नदियों में जाता है | यह स्नोमेल्ट क्षेत्र नदियों व नालों के लिये पानी का महत्वपूर्ण श्रोत है | इससे पेयजल, सिंचाई, और हाइड्रो पॉवर के लिये पानी की आपूर्ति होती है | अब अगर बर्फ़ नहीं गिरेगी तो इन नदियों और नालों के लिये पानी की कमी हो जाएगी | जिससे इस क्षेत्र और निचले इलाकों में भी पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा |
- जंगलों में आग लगना – विशेषज्ञों की मानें तो बिना बर्फ़ और बारिश के सूखी परिस्थितियों में हिमालयी जंगलों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ सकती है | कुछ ऐसी घटनाएँ तो अभी कुछ सालों में देखी भी गयी है | जैसे जोशीमठ, चमोली, नैनीताल, अल्मोड़ा, कुल्लू घाटी, सोलन, पीर पंजाल रेंज, बांदीपोरा, उरी आदि वनाग्नि प्रभावित क्षेत्र हैं |
- प्राकृतिक आपदाएं – बर्फ़ और हिम पहाड़ों की चट्टानों व ग्लेशियरों के लिये सीमेंट की तरह काम करती है | कम बर्फ़बारी और ग्लेशियर के ख़त्म होने से पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं | जिससे चट्टानें गिरना, भूस्खलन, ग्लेशियर झीलों का फ़टना, भारी मलबा बहना आदि प्राकृतिक आपदाएं आती है |
- पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव – कम बर्फ़बारी से उत्तरी भारत के राज्यों और नेपाल के पर्यटन क्षेत्रों पर असर पड़ेगा | घूमने, स्कीइंग और ट्रेकिंग के लिये आने वाले लोग कम हो जायेंगे | इससे क्षेत्रीय लोगों के रोजगार प्रभावित होंगे |
- कृषि – सर्दियों में होने वाली बारिश और बर्फ़बारी रबी की फसलों के लिये फ़ायदेमंद होती है | इसकी कमी से रबी की फसलों और बागवानी फसलों को नुकसान होगा | जिससे यहाँ का व्यापार भी प्रभावित होगा और किसानों की आजीविका भी कम हो जाएगी |
- वन स्थिरता – आजीविका के लिये वनों पर निर्भर लोगों की स्थिति भी दयनीय हो जाएगी |
- पारिस्थितिकी व जैव विविधिता पर तनाव – हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र पौधों की निष्क्रिय अवस्था और वन्य जीवों के जीवन के लिये पूर्वानुमानित हिमपात चक्रों पर निर्भर करता है | इन चक्रों में बदलाव से यहाँ की जैव विविधता भी प्रभावित होगी |

कुछ आंकड़े जिन्हें जानना जरुरी है –
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 2025 में दिसम्बर महीने में लगभग पूरे उत्तर भारत में बारिश व बर्फ़बारी नहीं हुई | सबसे अधिक संभावना है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर व लद्दाख जैसे राज्यों समेत उत्तर पश्चिम भारत के अधिकांश हिस्से में जनवरी और मार्च के बीच लम्बी अवधि की औसत ( L.P.A. ) बारिश व बर्फ़बारी में 86 % की कमी आएगी | ( L.P.A.- किसी क्षेत्र में 30 – 50 सालों में दर्ज की गई बारिश या बर्फ़बारी है और इसके औसत का उपयोग वर्तमान मौसम को सामान्य, अधिक या कम के रूप में वर्गीकृत करने के लिये किया जाता है |)
मौसम विभाग के अनुसार 1971 – 2020 के बीच उत्तर भारत में L.P.A. के हिसाब से औसत बारिश 184.3 मिलीमीटर रही | मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश में आई तेज गिरावट कोई एक बार की घटना नहीं है | यह हर वर्ष होती रहती है |
हंट के मुताबिक अलग – अलग डेटा सेट में पुख्ता सबूत मौजूद है कि हिमालय में सर्दियों की बारिश वास्तव में घट रही है | उनके सह – लेखन में 2025 में प्रकाशित स्टडी में 1980 से 2021 तक के चार डेटा सेट शामिल है | सभी में पश्चिमी हिमालय व केंद्रीय हिमालय के कुछ हिस्सों में बारिश में कमी दिखाई गयी है |
जम्मू स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी के रिसर्च फ़ेलो हेमंत सिंह का कहना है कि उत्तर पश्चिम हिमालय में पिछले 5 सालों में बर्फ़बारी 40 साल के दीर्घकालिक औसत ( 1980 – 2020 ) की तुलना में 25 % कम हुई है | नेपाल के भी यही हालात है | वहां भी अभी तक बारिश नहीं हुई है और पिछले 5 सालों से हर सर्दी में यही हाल है |
हालाँकि कुछ मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के कुछ सालों में कुछ सर्दियों मे भारी बर्फ़बारी हुई है लेकिन ये घटनाएँ कुछ इलाकों तक सीमित है | कुछ इलाकों मे भारी बारिश भी हुई है लेकिन ये हर सर्दियों की तरह सामान्य बारिश नहीं बल्कि ख़राब मौसम वाली बारिश है |
वैज्ञानिकों का दूसरा तरीका बर्फ़बारी में गिरावट में आंकलन का है | पहाड़ों पर कितनी बर्फ़ इकट्ठा हुई और उसमें से कितनी बर्फ़ बिना पिघले जमीं रही ( इसे स्नो परसिस्टेंस यानि बर्फ़ के टिकने का समय कहते हैं ) | इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवेलपमेंट ( ICIMOD ) के अनुसार 2024 – 2025 की सर्दी में बर्फ़ के टिके रहने की अवधि में करीब 24 % की कमी देखी गई जो पिछले 23 सालों में रिकॉर्ड कमी है | रिपोर्ट के अनुसार 2020 – 2025 यानि 5 सालों में से 4 सर्दियों में हिन्दुकुश हिमालय क्षेत्र में बर्फ़ का टिकाव सामान्य से कम रहा |
जम्मू में IIT से जुड़े हेमंत सिंह के सह – लेखन में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्र में स्नो ड्रोट की घटनाओं में वृद्धि हुई है, खासतौर पर 3000 – 6000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में |
ICIMOD की स्नो अपडेट रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र की 12 प्रमुख नदी घाटियों में कुल वार्षिक रन ऑफ़ का औसतन करीब एक चौथाई हिस्सा बर्फ़ के पिघलने से आता है | ऐसे में मौसमी तौर पर बर्फ़ के टिकाव में गड़बड़ी इन नदी घाटियों के दो अरब लोगों की जल सुरक्षा को प्रभावित करती है | विशेषज्ञों ने चेताया है कि हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना लम्बे समय में पानी की कमी का ख़तरा बढ़ाता है, जबकि कम बर्फ़बारी व तेज स्नोमेल्ट भविष्य में जल आपूर्ति के लिये ख़तरा बन सकता है |
आगे की राह और समाधान –
मौसम वैज्ञानिकों द्वारा कुछ समाधान सुझाये गये हैं जो निम्न प्रकार है –
- हिम और मौसम निगरानी को सुदृढ़ करना – उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व लद्दाख में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ( IMD ) द्वारा ऊंचाई वाले स्वचालित मौसम स्टेशनों का विस्तार करना तथा उपग्रह आधारित निगरानी ( INSAT, CARTOSAT ) को एकत्रित करना ताकि पश्चिमी विक्षोभ की भविष्यवाणी व बर्फ़बारी की भविष्यवाणी को सुधार सकें |
- कृत्रिम हिमनद व हिम संचयन – लद्दाख में वर्ष 2025 अंतर्राष्ट्रीय हिमनद संरक्षण वर्ष के तहत शुरू कृत्रिम हिमनद व आइस स्टुपा परियोजनाओं का विस्तार करना चाहिए | इससे शीतकालीन जल को संगृहीत किया जा सकेगा तथा बसंत ऋतु में इसका मुक्त प्रवाह किया जा सकेगा |
- जल सहिष्णु कृषि करना – रबी की फसलों में सूखा सहिष्णु गेहूं व सरसों की किस्मों को बढ़ावा देना, सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना होगा |
- वनाग्नि की रोकथाम के पुख्ता उपाय करने होंगे |
- सतत शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा – हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ़ आधारित गतिविधियों से आगे बढ़कर पर्यटन का विविधिकरण करना चाहिए | इससे सर्दियों के अलावा भी अन्य मौसम में पर्यटन की कमी नहीं होगी और रोजगार बना रहेगा |
निष्कर्षतः –
हिमालय का ब्लैक विंटर ( बिना बर्फ़ की सर्दियाँ ) हमारे लिये एक वेक अप कॉल है | हिमालय की सूखी ढलानें और बर्फ़ का इंतजार करते पहाड़ हमें याद दिला रहे हैं कि प्रकृति के साथ हमारा तालमेल बिगड़ चुका है | हालाँकि हम बीते हुए समय को नहीं बदल सकते, लेकिन भविष्य को बचाने के लिये छोटे कदम जरुर उठा सकते हैं | सस्टेनेबल टूरिज्म को अपनाना और कार्बन फुटप्रिंट को कम करना, ये कदम अब हमें ही उठाने होंगे | यही एकमात्र रास्ता है जिससे हम अपनी देवभूमि के मुकुट को फिर से बर्फ़ से चमकता देख पाएंगे |
क्या आपको भी लगता है कि हमारे पहाड़ों को बचाने के लिये अब सख्त कदम उठाने का वक्त आ गया है ? अपनी राय कमेंट में जरुर बताएं |
( डिस्क्लेमर : इस लेख में साझा किये गये आंकड़े और रिपोर्ट्स विभिन्न समाचार माध्यमों और मौसम संबंधी शोधों पर आधारित है | समय और नई रिसर्च के साथ इन आंकड़ों में बदलाव संभव है | कृपया किसी भी गंभीर वैज्ञानिक निष्कर्ष के लिये आधिकारिक सरकारी वेबसाइट या संबंधित संस्थानों की रिपोर्ट का सन्दर्भ लें |)

आपके द्वारा प्रकृति के संदर्भ में लिखा गया लेख काफी सराहनीय एवं पढ़ने योग्य है। आपके द्वारा प्रदत जानकारियां दुर्लभ ही उपलब्ध होती हैं। आपके लेख के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं
संदीप शर्मा इंदौर समाचार महू
बहुत अच्छा लेख है ।
जो एक पल के लिए बर्फीले हिमालय का दीदार करता है और उसके भविष्य की चिंता जाया करता है।।
Climate change has started to impact even Himalayas.
Your articles on nature and it’s impact on everything are really good.
Well done.👍
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