Continental Drift क्या होता है | पूरी जानकारी पढिए

महाद्वीपीय प्रवाह ( Continental Drift ) क्या होता है ? पूरी जानकारी ।

हम जानते हैं कि हर एक स्थलखंड किसी न किसी महाद्वीप का हिस्सा होता है। आज से करोड़ों वर्ष पहले इस पृथ्वी पर महाद्वीपों की वो स्थिति नहीं थी जो आज है । आज हमारी पृथ्वी पर सात महाद्वीप व कई छोटे-छोटे द्वीप मौजूद है । ऐसा माना जाता है कि महाद्वीपों को मिला यह वर्तमान स्वरूप महाद्वीपीय विस्थापन या Continental Drift की वजह से मिला है । प्राचीन समय में सब महाद्वीपों से मिलकर एक महान महाद्वीप या अधिमहाद्वीप बना हुआ था। यानी एक बहुत बड़ा महाद्वीप था जिसे पेन्जिया कहा गया । यह महाद्वीप चारों ओर से एक महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैन्थालासा कहा गया ।

कालांतर में पेन्जिया के टूटने से दो महाद्वीप बने । उन्ही दोनों महाद्वीपों के फिर से टूटने और विस्थापित होने की वजह से आज हम हमारे महाद्वीपों का वर्तमान रूप देख रहे हैं। यह कैसे हुआ और क्या है महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत,आइए विस्तार से समझते हैं –

महाद्वीपीय प्रवाह ( Continental Drift) सिद्धांत –

किसी स्थल खंड या महाद्वीप का प्रवाहित होना अर्थात् बहकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना ही महाद्वीपीय प्रवाह या महाद्वीपीय विस्थापन कहलाता है।

सर्वप्रथम 1908 में एफ. बी. टेलर ने महाद्वीपीय विस्थापन को सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया । इनका उद्देश्य था टर्शियरी युग के वलित पर्वतों का अध्ययन करना । इन्होंने बताया कि रॉकीएंडीज पर्वतों का विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा में है तो आल्पसहिमालय पर्वत का विस्तार पूर्व से पश्चिम दिशा में है । इन्होंने मत दिया कि स्थल भागों का क्षैतिज दिशा में स्थानांतरण हुआ है।

इसके पश्चात जर्मनी के मौसम विज्ञानी व भू भौतिकीविद् अल्फ़्रेड वेगनर ने 1912 में अपनी पुस्तक The Origin of Continents and Oceans में महाद्वीपों की उत्पत्ति व उनके वितरण के संबंध में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्रस्तुत किया । इनका उद्देश्य था पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन संबंधी समस्या का समाधान करना । यानी वर्तमान में जो क्षेत्र उष्णकटिबंधीय हैं जैसे – ब्राजील, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया व प्रायद्वीपीय भारत, इन पर हिमावरण के निशान मिलते हैं। वहीं मध्य अक्षांशीय ठंडे प्रदेशों में कोयले का पाया जाना भी पृथ्वी पर हुए जलवायु परिवर्तन को दर्शाता है।

वैगनर ने इसे दो रूपों में स्पष्ट किया –

  1. स्थल भाग स्थिर रहे और जलवायु कटिबंधों में परिवर्तन हुआ । यानी एक ही स्थान पर कभी शीत, कभी उष्ण व शुष्क तो कभी आर्द्र जलवायु का होना ।
  2. जलवायु कटिबंध स्थिर रहे और स्थल भाग में परिवर्तन हुआ ।

वेगनर ने अपने सिद्धांत का आधार दूसरी परिकल्पना को माना ।

वेगनर के अनुसार कार्बोनिफेरस युग में पेन्जिया का विभाजन शुरू हुआ। इसके पश्चात् पेन्जिया दो महाद्वीपों में टूट गया । उत्तरी महाद्वीप को लॉरेसिया या अंगारालैंड कहा गया तो दक्षिणी भाग गोंडवानालैंड कहा गया । इन दोनों महाद्वीपों के मध्य एक छिछला समुद्र स्थित था जिसे टेथिस सागर कहा जाता है । कालांतर में ये दोनों महाद्वीप भी विभाजित होने लगे । लोरेशिया के विभाजित होने से उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया महाद्वीप बने । गोंडवानालैंड के विभाजित होने से दक्षिण अमेरिका, प्रायद्वीपीय भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, मेडागास्कर व अंटार्कटिका महाद्वीप बने । यह महाद्वीप विस्थापित होकर आज के वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुए ।

इस प्रकार वैगनर ने महाद्वीपों की वर्तमान स्थिति को समझाने का प्रयास किया ।

अल्फ्रेड वेगनर के Continental Drift सिद्धांत मे महाद्वीपों का विस्थापन
महाद्वीपों का विस्थापन ( image source – wikimedia commons )

Continental Drift ( महाद्वीपीय विस्थापन ) के लिए उत्तरदायी शक्तियां

वैगनर ने महाद्वीपीय प्रवाह के लिए इन दो बलों को उत्तरदायी माना –

  1. गुरुत्वाकर्षण बल व प्लवनशीलता का बल – वैज्ञानिकों के अनुसार महाद्वीप कम घनत्व वाले सियाल ( si + al ) से बने हैं । अर्थात इस भाग में सिलिका व एलुमिनियम की मात्रा अधिक है । इस कारण यह हल्का व कम शक्तिशाली भाग है । यह भाग अधिक घनत्व वाली सीमा ( si + ma ) से बना है । अर्थात इस भाग में सिलिका व मैग्नीशियम अधिक मात्रा में है । इस भाग में समुद्र तलहटी की चट्टानें पाई जाती है । सियाल सीमा पर तैरता रहता है । वेगनर का मानना है कि दोनों बलों के प्रभाव से महाद्वीपों का भूमध्य रेखा की ओर विस्थापन हुआ ।
  2. ज्वारीय बल – सूर्य व चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी पर उत्पन्न बल ज्वारीय बल कहलाता है। हम जानते हैं की पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है। पृथ्वी के घूर्णन में ज्वारीय शक्ति व्यवधान उत्पन्न करती है । जिससे महाद्वीपीय भाग घूर्णन में पृथ्वी का साथ नहीं दे पाते और पीछे छूट जाते हैं । इसी कारण महाद्वीपों का पश्चिम की ओर विस्थापन होता है ।

वेगनर का मानना था कि ध्रुवों की स्थिति में भी परिवर्तन होता रहा है जिसे ध्रुवीय भ्रमण की संज्ञा दी।

वैगनर ने पर्वत निर्माण में भी महाद्वीपीय विस्थापन को जिम्मेदार माना। उनके अनुसार उत्तर व दक्षिण अमेरिका के पश्चिम की ओर विस्थापन से रॉकी व एंडीज पर्वतों का निर्माण हुआ। आल्पस व हिमालय पर्वतों का निर्माण यूरेशिया महाद्वीप के दक्षिण की ओर विस्थापन व अफ्रीका तथा प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर की ओर विस्थापन से टेथिस सागर की भू अभिनति में वलन पड़ने से हुआ ।

वेगनर के सिद्धांत के पक्ष में विचार

वैगनर ने अपने सिद्धांत को सही साबित करने के लिए बहुत सारे साक्ष्य व विचार बताए । आईए जानते हैं वे विचार कौन-कौन से हैं –

  • साम्य स्थापना या जिगसॉ फिट – वेगनर का मानना था कि अगर वर्तमान महाद्वीपों को एक साथ मिलाने की कोशिश करें तो वह एक- दूसरे में फिट हो जाएंगे। जैसे ब्राजील के उभार को गिनी की खाड़ी में भली-भांति मिलाया जा सकता है । वैसे ही पश्चिमी ग्रीनलैंड, बैफिनलैंड, ऐल्समी लैंड तथा उत्तरी अमेरिका के विभिन्न पूर्वी भागों का पश्चिमी यूरोपीय तट से साम्य स्थापित होता है ।
  • भू वैज्ञानिक समानता – अटलांटिक महासागर के पूर्व व पश्चिम में स्थित तटीय भागों की भू वैज्ञानिक रचना में समानता मिलती है । उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका तथा यूरोप व अफ्रीका के वलन ( हर्सीनियन वलन – यूरोप, कैलिडोनियन वलन – यूरोप व उत्तरी अमेरिका, ब्राज़ीलाइड वलन आदि ) को जोड़ने पर एक ही भूखंड के टूटे हुए हिस्से लगते हैं ।
  • पर्वत निर्माण – जैसा कि हमने पहले पढ़ा महाद्वीपों के विस्थापन से विभिन्न पर्वतों का निर्माण हुआ । जैसे – रॉकी, एंडीज, हिमालय, आल्पस, एटलस पर्वत आदि ।
  • पुरा जलवायु प्रमाण – ऐसे प्रमाण मिले हैं कि कार्बोनिफरस युग में दक्षिण अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, प्रायद्वीपीय भारत, दक्षिण पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, मालागासी, तस्मानिया व अंटार्कटिका में शीत जलवायु पाई जाती थी ।
  • पुरा जीवाश्मी प्रमाणग्लौसोप्टेरिस वनस्पति के अवशेष ऑस्ट्रेलिया,अंटार्कटिका, भारत, दक्षिण अमेरिका व दक्षिण अफ्रीका में पाया जाना । मिजोसोर्स नामक जलीय सरीसृप के फॉसिल ब्राज़ील व अफ्रीका में मिलना । साइनोग्नेयिम नामक जीव के जीवाश्म अर्जेंटीना व दक्षिण अफ्रीका में मिले । लिट्रोसोर्स जो की एक स्थलीय जीव था उसका दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, अंटार्कटिका व भारत में मिलना भी महाद्वीपीय विस्थापन को दर्शाता है।
  • जंतुओं का व्यवहार – स्कैंडिनेविया के उत्तरी भाग में लेमिंग्स नामक जीव पाया जाता है, जो ॠतु विशेष में पश्चिम की ओर यात्रा करता है । अपनी इस आदत के कारण वह जीव अटलांटिक महासागर में कूद कर अपने प्राण त्याग देता है । ऐसा मान सकते हैं कि उसके पूर्वज किसी स्थलखंड से परिचित थे जो अब नहीं है। लेकिन उस जीव में अपने पूर्वज से मिली यह आदत अभी भी पाई जाती है ।
  • विश्व में कोयले का वितरण – विश्व का अधिकांश कोयला यूरेशिया में पाया जाता है। जहां अभी जलवायु ठंडी व कम वनावरण मिलता है । माना जाता है कि कार्बोनिफेरस युग में भूमध्य रेखा यूरेशिया से गुजरती थी । इसलिए वहां वनस्पति अधिक पाई जाती थी, जिसके भूगर्भ में दबने से कोयले क निर्माण हुआ ।

वेगनर के सिद्धांत के विपक्ष में विचार

कई वैज्ञानिक वेगनर के इस सिद्धांत से संतुष्ट नहीं थे । इस विषय में अनेक वैज्ञानिकों द्वारा कई विचार प्रस्तुत किए गए । यह निम्न प्रकार है –

  • साम्य स्थापना में त्रुटि – कई वैज्ञानिक वेगनर द्वारा बताए गए महाद्वीपों के साम्य स्थापना से असंतुष्ट है । इस विषय में उनका कहना है कि दक्षिण अमेरिका व गिनी तट को मिलाया जाए तो वहां 15 डिग्री का अंतर मिलता है, जो की बहुत ज्यादा है । यानी यह दोनों तट ठीक से फिट ही नहीं हो रहे ।
  • विस्थापन की दिशा से असहमति – वैगनर ने महाद्वीपों को पश्चिम दिशा व भूमध्य रेखा की ओर विस्थापित माना । जबकि एफ.बी. टेलर ने महाद्वीपों को दोनों ध्रुवों की ओर विस्थापित बताया । वही जे. डब्ल्यू. इवांस ने महाद्वीपों का विस्थापन केंद्र अफ्रीका को माना जहां से महाद्वीप पूर्व, पश्चिम व दक्षिण दिशा में विस्थापित हुए ।
  • महाद्वीपों का वर्तमान वितरण विस्थापन के अनुकूल नहीं – वेगनर में महाद्वीपों को भूमध्य रेखा की तरफ विस्थापित माना जबकि अधिकांश महाद्वीप भूमध्य रेखा के पास स्थित नहीं है ।
  • विस्थापन के लिए शक्तियों का पर्याप्त होना – वैज्ञानिकों का मानना है कि वैगनर ने जिन बलों को विस्थापन के लिए उत्तरदाई माना वह इतने शक्तिशाली नहीं है कि महाद्वीपों को प्रवाहित कर सके ।
  • वलन संबंधी आपत्ति – कई वैज्ञानिकों ने महाद्वीपीय विस्थापन को पर्वतों के निर्माण में संभव बताया । विलिस के अनुसार महाद्वीपों के विस्थापन से रॉकी और एंडीज जैसे बड़े पर्वतों का निर्माण नहीं हो सकता ।
  • समय संबंधी आपत्ति – वैज्ञानिकों का कहना है कि पेंजीया का विखंडन कार्बोनिफेरस युग में ही क्यों हुआ । उससे पहले इन महाद्वीपों को किस बल ने जोड़कर रखा था । और महाद्वीपीय विस्थापन इसी युग में क्यों हुआ इससे पहले या बाद में क्यों नहीं ।

निष्कर्ष – वैसे तो अल्फ्रेड वेगनर ने अपने सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए बहुत साक्ष्य बताएं । लेकिन कोई भी साक्ष्य ठोस रूप से यह नहीं बता पाया कि महाद्वीपों का विस्थापन क्यों और किस तरह से हुआ ? इसलिए समय के साथ इस सिद्धांत को नकार दिया गया । इसके पश्चात एक नया सिद्धांत दिया गया जो सबसे अधिक मान्य है – प्लेट टेक्टोनिक्स (प्लेट विवर्तनिकी )

इसका अध्ययन हम अगले लेख में करेंगे ।

आपको यह लेख कैसा लगा हमें जरूर बताएं ।

3 thoughts on “महाद्वीपीय प्रवाह ( Continental Drift ) क्या होता है ? पूरी जानकारी ।”

  1. Pingback: प्लेट विवर्तनिकी ( Plate Tectonics ) सिद्धांत क्या होता है ? - GREEN VIDYALAYA

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