आजकल लोग पर्यावरण व क्लाइमेट चेंज के प्रति सचेत होने लगे हैं। ऐसे में जब कार्बन सोखने की बात दिमाग में आती है तो हरे-भरे जंगलों और पेड़ों की तस्वीर हमारे सामने आ जाती है । लेकिन क्या आप जानते हैं जंगलों से भी ताकतवर एक ऐसा नायक समुद्र की गहराई में छिपा है । वह है – Blue carbon
यह अमेजन के जंगलों से भी 10 गुना तेजी से कार्बन सोखता है । आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है तब यूनेस्को और दुनिया भर के वैज्ञानिकों को इस नीले खजाने ने उम्मीद की किरण दिखाई है । ब्लू कार्बन प्रारंभ से लेकर अब तक चुपचाप पर्यावरण की रक्षा करता चला आ रहा है । पर क्या आगे भी यह ऐसा कर पाएगा ? कैसी है इस समुद्र में छिपे नायक की दुनिया ? यह कैसे कार्य करता है ? आईए पढ़ते हैं वो बातें जिन्हें जानना सबके लिए जरूरी है –
Blue carbon क्या है –
तटीय व समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में संग्रहित कार्बन को ब्लू कार्बन कहते हैं । तटीय पारिस्थितिक तंत्र में ब्लू कार्बन के स्रोत हैं – मैंग्रोव वन, ज्वारीय व खारे दलदल और समुद्री घास । तटीय पारिस्थितिक तंत्र के ये स्रोत पौधों में व नीचे की तलछट दोनों में बड़ी मात्रा में ब्लू कार्बन को अवशोषित व संग्रहित करके रखते हैं । मैंग्रोव वनों के पेड़ व पौधे और समुद्री घास पर्यावरण की CO2 को प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के दौरान खींचते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं । वे इस कार्बन का उपयोग पेड़ों की पत्तियों व शाखाओं में करते हैं । जब पेड़ की पट्टियां टूट कर नीचे गिर जाती है तो यह कार्बन समुद्र में मिट्टी के नीचे दब जाती है और सालों-साल वहीं दफन रहती है । मैंग्रोव वनों की उलझी हुई जड़ें और समुद्री घास की घनी पत्तियां पानी के बहाव को कम कर देती है । इससे पानी में तैरते कार्बनिक कण मिट्टी में नीचे बैठ जाते हैं और मिट्टी का हिस्सा बन जाते हैं । इस प्रकार यह पानी को छानने का भी कार्य करता है |
Blue carbon कहां पाए जाते हैं –
ब्लू कार्बन के यह स्त्रोत अंटार्कटिका महाद्वीप के अलावा प्रत्येक महाद्वीप के तटों पर पाए जाते हैं । यह मैंग्रोव वन, दलदल व समुद्री घास के रूप में होते हैं । इन सभी पारिस्थितिक तंत्र का कुल अनुमानित क्षेत्रफल लगभग 49 मिलियन हेक्टेयर है । यह इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया, ब्राजील व भारत में प्रमुख रूप से पाए जाते हैं । मैंग्रोव वन 13.8 से 15.2 मिलियन हेक्टेयर में ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया व भारत के उष्णकटिबंधीय तटों पर फैले हैं । समुद्री घास के मैदान 17.7 से 60 मिलियन हेक्टेयर में फैले हुए हैं । ज्वारीय दलदल 2.2 से 40 मिलियन हेक्टेयर के क्षेत्र में समशीतोष्ण कटिबंधों में अधिकतर पाए जाते हैं । इतने कम क्षेत्र में फैले होने के बावजूद यह स्थलीय वनों की तुलना में दो से चार गुना अधिक कार्बन का अवशोषण करते हैं ।

तटीय नीले कार्बन पारिस्थितिक तंत्र क्यों महत्वपूर्ण है –
यह तटीय पारिस्थितिक तंत्र आर्थिक व पर्यावरणिक दोनों ही दशाओं में हमारे लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है । ये पर्यावरण से कार्बन सोखने के साथ-साथ तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की खाद्य व आर्थिक जरूरतों को भी पूरा करते हैं । इन्हें जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक समाधानों का एक प्रमुख घटक माना जा सकता है । आईए इसके कुछ और फायदों को भी जानते हैं –
- ये स्थलीय भाग से आने वाली कार्बन को सोखकर तटीय जल की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं ।
- ये जल की अधिक कार्बन को सोख कर स्वस्थ मत्स्य पालन को बढ़ाने में मददगार हैं । इनके तटों पर मछली भंडार पाया जाता है, जिससे तटीय समुदायों व उनकी आजीविका को ये बनाए रखते हैं ।
- यह समुद्री जीवों के लिए आवास का कार्य करते हैं व उनके लिए खाद्य सुरक्षा भी प्रदान करते हैं ।
- ये महासागरों व प्रवाल भित्तियों में बहने वाले पानी को छानते हैं और समुद्री जीवों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराते हैं ।
- यह तट रेखाओं के कटाव को रोकते हैं और तूफानी लहरों व बाढ़ से तट की सुरक्षा करते हैं ।
- वैश्विक कार्बन का 83% हिस्सा महासागरों के माध्यम से प्रसारित होता है ।
- समुद्री घास मैदानों में 95% से ज्यादा कार्बन मिट्टी में संग्रहित रहता है ।
- यह तटीय पर्यावास हर साल 0.84 बिलियन टन से अधिक कार्बन को सोखते हैं ।
- महासागरीय तलछटों में कुल कार्बन का लगभग आधा हिस्सा संचित रहता है ।
- यह समुद्र के केवल 0.5% भाग को कवर करते हैं परंतु 50% से ज्यादा कार्बन को अवशोषित करते हैं ।

तटीय नीले कार्बन पारिस्थितिक तंत्र के सामने चुनौतियां –
इस तटीय पारिस्थितिक तंत्र के सामने अब कई चुनौतियां उभरने लगी है । धीरे-धीरे यह समाप्त होते जा रहे हैं । तटीय पारिस्थितिक तंत्र सबसे ज्यादा खतरे में पड़ा पारिस्थितिक तंत्र है । हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने और औद्योगिक विकास के कारण इन वनों को तेजी से काटा जा रहा है। इस कारण हमारे सामने जलवायु परिवर्तन को लेकर नई समस्याएं खड़ी होती जा रही है । अगर इस तटीय पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचता है तो अब तक जमा कार्बन फिर से पर्यावरण में मिल जाएगी और एक नया खतरा सामने आएगा । जानते हैं इसके हानिकारक परिणाम –
- मैंग्रोव वनों का प्रतिवर्ष 2% की दर से क्षय हो रहा है । तटीय विकास और शहरीकरण, कृषि, झींगा पालन, ईंधन व इमारती लकड़ी के लिए मैंग्रोव वनों को तेजी से काटा जा रहा है । विशेषज्ञों की माने तो मैंग्रोव वनों की कटाई से होने वाला कार्बन उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर वनों की कटाई से होने वाले कार्बन उत्सर्जन से 10% ज्यादा है । 1950 से अब तक 50% मैंग्रोव वन नष्ट हो चुके हैं ।
- ज्वारीय दलदल प्रतिवर्ष 1 से 2% की दर से नष्ट हो रहे हैं । तटीय विकास जैसे – बंदरगाह, शहर और सड़कों के निर्माण के लिए इन क्षेत्रों को सुखा दिया जाता है । दलदली जमीनों को खेती करने की जमीन या झींगा पालन के तालाबों में बदल दिया जाता है । जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता समुद्री जल स्तर इन दलदली क्षेत्र को डुबो रहा है। अब तक 50% से ज्यादा दलदली क्षेत्र समाप्त हो चुके हैं ।
- समुद्री घास समुद्र के 0.2% से भी कम हिस्से में फैली है फिर भी हर साल महासागर में जमा होने वाली कार्बन का 10% हिस्सा संग्रहित करती है । प्रतिवर्ष 1.5% की दर से समुद्री घास नष्ट हो रही है। अब तक इसका 30% हिस्सा खत्म हो चुका है । इसका प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण व मानवीय हस्तक्षेप है ।
तटीय पारिस्थितिक तंत्रों के नष्ट होने पर सदियों से संचित कार्बन वायुमंडल व महासागरों में उत्सर्जित होने लगेगी । जिससे यह ग्रीनहाउस गैस के प्रमुख स्रोत बन जाएंगे । विशेषज्ञों की माने तो प्रतिवर्ष 1.02 अरब टन CO2 टूटे-फूटे तटीय पारिस्थितिक तंत्र की वजह से उत्सर्जित हो रही है । यह वैश्विक स्तर पर उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई से होने वाले उत्सर्जन के 19 % के बराबर है । मैंग्रोव वनों की कटाई उष्णकटिबंधीय वनों की तुलना में चार गुना तेजी से की जा रही है । पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार के आधार पर अनुमानित वार्षिक हानि 0.5 से 3% है । इसका मुख्य कारण मैंग्रोव वनों का दोहन, शहरी व औद्योगिक तटीय विकास, बढ़ता जल प्रदूषण, कृषि व मत्स्य पालन का दबाव है ।

तटीय पारिस्थितिक तंत्र की बहाली व संरक्षण –
अब इस पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण की ओर ध्यान दिया जाने लगा है । वैज्ञानिक शोध, नीति निर्माण व संरक्षण परियोजनाओं द्वारा इसके संरक्षण की पहल की जाने लगी है । विश्व के सभी देश अब इस तटीय पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए नीतियां बनाने लगे हैं ।
- अंतर्राष्ट्रीय ब्लू कार्बन साझेदारी ( IPBC ) और ब्लू कार्बन इनीशिएटिव द्वारा इस पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए कई योजनाएं बनाई जा रही है ।
- वैश्विक संगठनों द्वारा भी रामसर सम्मेलन के अंतर्गत कई संरक्षण नीतियां बनाई गई है ।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना ( CCTS ) व वैज्ञानिक अध्ययन से कार्बन भंडारण का लगातार मूल्यांकन किया जा रहा है ।
- वैश्विक संगठन यूनेस्को का अंतर सरकारी समुद्र विज्ञान आयोग ( IOC-UNESCO ) और कंजर्वेशन इंटरनेशनल साथ मिलकर इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं । वे इस दिशा में वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ाने, नीति विशेषज्ञता प्रदान करने व संरक्षण परियोजनाएं लागू करने में लगे हैं ।
- सरकारें राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान ( NDCs ) में तटीय पारिस्थितिक तंत्र को शामिल कर रही है । जिससे कार्बन उत्सर्जन की कमी के लक्ष्यों को पूरा कर सकें ।
- मैंग्रोव व सीग्रास कार्बन को कैसे संग्रहित करते हैं तथा जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कैसे सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं, इसे समझने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा रहे हैं ।
- भारत में भी 5 जून 2023 से मैंग्रोव वनों को बचाने के लिए पीआईबी के तहत मिष्टी योजना शुरू की गई है ।
निष्कर्ष –
वैसे तो तकनीकी रूप से कार्बन कैप्चर की दिशा में बहुत कार्य हो रहा है, लेकिन ब्लू कार्बन इस दिशा में एक प्राकृतिक हथियार साबित हो रहा है । ऐसा हथियार जो सदियों से पर्यावरण को बचाने की दिशा में लगा हुआ है । लेकिन अब मुश्किल यह है कि ये पारिस्थितिक तंत्र तेजी से खत्म हो रहे हैं और इन्हें बचाना और भी ज्यादा आवश्यक हो गया है । अगर आज हम इन समुद्री वनों को बचाते हैं तो कल यह हमें और हमारे आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण देने में मदद करेंगे । अगर ये नष्ट हो गए तो उनके द्वारा संचित कार्बन पर्यावरण व मानव जाति दोनों को नष्ट कर देगी । इसलिए हमें प्रशासन के साथ मिलकर अब इस दिशा में कदम उठाना ही पड़ेगा ।
तो आईए इस नीले कार्बन के महत्व को समझें और इसके संरक्षण का प्रयास करें ।
क्या आपको भी लगता है कि हमें इस तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए ? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ।
( डिस्क्लेमर – लेख में दिए गए सभी आंकड़े विभिन्न विश्वसनीय स्रोतों से लिए गए हैं। लेकिन इनमें समय के साथ बदलाव हो सकता है । सटीक जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट और रिपोर्ट्स को देखें । )

यह एक बेहतरीन पहल है! मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि हमें अपनी धरती को हरा-भरा, प्लास्टिक मुक्त और स्वच्छ रखना चाहिए। एक पौधा लगाना या कम प्लास्टिक का उपयोग करना, मैं भी अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेता हूँ”।
Nature is the most beautiful and most important thing ever.
It keeps healing everything and most of us don’t even know it.
Nice and well written article. Keep the good work going on 👍
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