
AI ( आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ) आज के समय में एक दोस्त की तरह लगता है | यह हमारे दैनिक जीवन के कई कार्यों को आसान बनाता है | इसे तरक्की का प्रतीक माना जाता है | लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं | एक तरफ़ जहाँ एआई को फ़ायदेमंद समझा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह एक ख़ामोश लेकिन गंभीर खतरे को निमंत्रण दे रहा है, जो है – पानी का बढ़ता संकट | बहुत कम लोग जानते हैं कि एआई की वजह से रोज लगभग 50 लाख गैलन पानी की खपत होती है जो लगभग 10,000 से 50,000 लोगों की आबादी की रोजमर्रा की जरुरत के बराबर है | हम एआई का जितना ज्यादा प्रयोग करते जा रहे हैं पानी का संकट उतना ही बढ़ता जा रहा है | आज जहाँ दुनिया की आधी आबादी पहले से ही गंभीर जल संकट से जूझ रही है, उस पर AI डेटा सेंटर्स का इतना ज्यादा पानी का उपयोग करना क्या सही है ? क्या कोई ऐसे उपाय हैं जिससे तकनीक और पर्यावरण की सुरक्षा दोनों साथ चल सकें ? आइये बात करते हैं –
AI क्या है ? जानें AI का इतिहास –
AI ( आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ) एक परिवर्तनकारी तकनीक है जो मशीनों को इंसानों जैसे समस्या – समाधान कार्य करने में सक्षम बनाती है | छवियों को पहचानने, रचनात्मक सामग्री बनाने जैसे फोटो, विडियो, प्रोजेक्ट आदि के साथ – साथ डेटा आधारित भविष्यवाणियाँ करने तक में एआई का प्रयोग किया जाता है | इसमें कंप्यूटर सिस्टम या रोबोटिक सिस्टम तैयार करके उससे मानव मस्तिष्क के जैसे कार्य करवाने का प्रयास किया जाता है | एआई पर शोध की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी | एआई के जनक जॉन मैकार्थी को माना जाता है | इन्होंने ही 1956 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द को गढ़ा और LISP प्रोग्रामिंग भाषा विकसित की जो एआई के निर्माण की नींव बनी | आज एआई हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है |
AI डेटा सेंटर्स में पानी का सबसे बड़ा उपयोग –
आजकल हम हमारे बहुत से काम एआई की मदद से करते हैं, जैसे – तस्वीरें बनाना, वीडियो एडिटिंग करना, प्रोजेक्ट बनाना, और कुछ भी प्रश्न पूछना | ये सभी ऑनलाइन काम बड़े – बड़े डेटा सेंटर्स में प्रोसेस होते हैं | ये डेटा सेंटर्स कहीं – कहीं तो एक फुटबॉल मैदान जितने बड़े होते हैं | इन डेटा सेंटर्स में हजारों कंप्यूटर सर्वर्स होते हैं जो लगातार काम की वजह से गर्म हो जाते हैं | इन्हें ठण्डा रखने के लिये ताजा और साफ़ पानी की आवश्यक्ता होती है | रोज लगभग 50 लाख गैलन पानी इन सर्वर्स को ठण्डा करने के काम में लिया जाता है | कई कूलिंग सिस्टम में तो इसमें से 80 % पानी भाप बनकर उड़ जाता है जो कभी वापस नहीं आता |
Open AI के सीईओ सैम ऑल्टमैन के अनुसार चैट जीपीटी से 1 सवाल पूछने पर एक चम्मच के 15वें हिस्से जितना पानी खर्च होता है | यह आंकड़ा हमें भले ही कम लगे लेकिन चैट जीपीटी रोज लगभग 1 अरब सवालों के जवाब देता है | यानि यह आंकड़ा छोटा नहीं बल्कि बहुत बड़ा है | एक अमेरिकन स्टडी के अनुसार जीपीटी – 3 मॉडल 10 – 50 सवालों के जवाब देने में 500 मिलीलीटर पानी का उपयोग करता है | इसका मतलब है 1 जवाब देने का 2-7 चम्मच पानी प्रयोग होता है |
IEA (इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ) के अनुसार गूगल से सवाल पूछने के स्थान पर जीपीटी से सवाल पूछने पर 10 गुना ज्यादा बिजली की जरुरत होती है | यानि जितनी ज्यादा बिजली खर्च होगी गर्मी भी उतनी ही ज्यादा बढ़ेगी और उतना ही ज्यादा मात्रा में पानी इस्तेमाल होगा | लेखक व यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड के प्रोफ़ेसर शाओलेई रेन ने भी कहा है कि जितना ज्यादा एआई का प्रयोग होगा उतना ज्यादा पानी खर्च होगा |
आंकड़े क्या कहते हैं –
सभी एआई कंपनियों के आंकड़े अलग – अलग है | कुछ आंकड़े केवल डेटा सेंटर की कूलिंग में काम आने वाले पानी को गिनते हैं, जबकि कुछ आंकडों में बिजली बनाने में प्रयोग होने वाला पानी भी शामिल है | 2020 के बाद गूगल, माइक्रोसॉफ्ट व मेटा के पानी इस्तेमाल में भारी इजाफ़ा हुआ है | गूगल का पानी उपभोग तो दोगुना हो गया है | गूगल के डेटा सेंटर्स ने 2024 में पानी के श्रोतों से 37 अरब लीटर पानी लिया था, जिसमें से 29 अरब लीटर पानी खर्च हो गया ( भाप बनकर उड़ गया ) | संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इतना पानी 16 लाख लोगों की एक साल तक रोजाना के उपयोग की जरुरत को पूरी कर सकता है | गूगल के अनुसार इतना पानी अमेरिका के द. प. इलाकों में एक गोल्फ़ कोर्स को एक साल तक सींचने के बराबर है |
2025 में एआई का वाटर फुटप्रिंट 312.5 – 764.6 बिलियन लीटर के बीच था | जीपीटी -3 जैसे बड़े मॉडल को प्रशिक्षित करने में 7,00,000 लीटर ताजे पानी की खपत हो सकती है | 2026 की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग से जल की खपत भी और ज्यादा बढ़ेगी | एक अमेरिकन स्टडी के अनुसार 2027 तक एआई इंडस्ट्री डेनमार्क जैसे पूरे देश के मुकाबले 4-6 गुना ज्यादा पानी प्रयोग करेगी | अनुमानों के अनुसार 2028 तक 624 अरब से 1528 अरब लीटर या इसका भी दोगुना पानी खर्च हो सकता है | 2028 तक डेटा सेंटर प्रति वर्ष 1 ट्रिलियन लीटर से अधिक पानी का उपयोग करेंगे जो 2020 के मध्य के स्तर से भी 10 गुना अधिक है | IEA के अनुसार 2030 तक डेटा सेंटर्स की पानी की खपत दो गुना हो जाएगी, जिसमें बिजली व चिप बनाने में लगने वाला पानी भी शामिल है |
आखिर डेटा सेंटर्स में कहाँ उपयोग हो रहा है इतना पानी –
- एआई डेटा सेंटर्स में कंप्यूटर सर्वर्स को ठण्डा रखने के लिये जल आधारित दलदली शीतलन (शीतलन टावर ) का प्रयोग |
- जल उपयोग का 60% – 80% हिस्सा बिजली उत्पादन में खर्च |
- बिजली संयंत्रों द्वारा सर्वर्स के लिये बिजली उत्पन्न करने में उपयोग होने वाला पानी |
- हार्डवेयर निर्माण जैसे AI चिप ( G.P.U. ) के उत्पादन में |
- GPT – 3 जैसे बड़े मॉडल को प्रशिक्षित करने में |
विकासशील और विकसित देशों के लिये AI सबसे बड़ा ख़तरा –
एआई कम्पनियों के डेटा सेंटर्स बहुत सारे देशों में है |ज्यादातर डेटा सेंटर्स वैश्विक दक्षिण में हैं जबकि लाभ क्षेत्र वैश्विक उत्तर में है | एआई कम्पनियां अपने डेटा सेंटर्स ज्यादातर सूखे इलाकों में बनाती है | इसके पीछे कई कारण है | सूखे इलाकों में जमीन सस्ती दरों पर मिल जाती है | यहाँ पर बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर व सोलर विंड एनर्जी मिल जाती है, जिससे बिजली की समस्या का भी निवारण होता है | सूखे इलाकों में कम नमी से सर्वर में जंग लगने का ख़तरा भी कम रहता है |
लेकिन यही क्षेत्र पानी की सबसे ज्यादा किल्लत झेलते हैं | इन क्षेत्रों में पहले ही पानी की कमी होती है | उस पर ये डेटा सेंटर्स इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रहे हैं |
स्पेन, चिली, उरुग्वे व अमेरिका के एरिजोना जैसे सूखे इलाकों में इन डेटा सेंटर्स का विरोध किया जा रहा है | स्पेन में -” Your cloud is drying up my river “( तुम्हारा क्लाउड मेरी नदी सुखा रहा है ) नाम का पर्यावरण समूह डेटा सेंटर्स का विरोध कर रहा है |
गूगल के अनुसार उसके डेटा सेंटर्स में 14 फीसदी पानी उन इलाकों से आता है जिनमें पानी की कमी का ख़तरा ज्यादा तथा 14 फीसदी उन इलाकों से आता है जहाँ पानी की कमी का ख़तरा मध्यम होता है | माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार उसके डेटा सेंटर्स में 46 फीसदी पानी उन इलाकों से आता है जहाँ पानी पर दबाव ज्यादा हो | मेटा में भी 26 फीसदी पानी ज्यादा दबाव वाले इलाकों से ही आता है |
इस जल संकट से उबरने के तरीके जो AI कंपनियों ने सुझाये हैं –
एआई कम्पनियों ने पानी बचाने की दिशा में प्रयास शुरू तो किये हैं | लेकिन ये अभी सिर्फ शुरुआत है, रास्ता बहुत लम्बा है | पानी की जगह दूसरे विकल्प खोजने होंगे | इस दिशा में कम्पनियां पानी की जगह ड्राई या एयर कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है |लेकिन इसमें पानी की जगह बिजली ज्यादा खर्च होगी | इसी प्रयास में क्लोज्ड लूप का उपयोग करना भी शामिल है | क्लोज्ड लूप में पानी भाप बनकर उड़ेगा नहीं बल्कि सिस्टम के अन्दर घूमता रहेगा | कुछ देशों में डेटा सेंटर से निकली गर्मी का प्रयोग घरों को गर्म रखने में किया जायेगा | टेक कंपनियों ने 2030 तक वाटर पॉजिटिव बनने का लक्ष्य रखा है | अर्थात् जितना पानी प्रयोग में लेंगे उतना वापस लौटाएँगे |
ये सब संभावित योजनायें है, इन पर काम किया जाना अभी बाकी है | विशेषज्ञों की मानें तो बिना पारदर्शिता और सीमाओं के एआई का विस्तार पर्यावरण के लिये टिकाऊ ( sustainable ) नहीं है | डेटा सेंटर्स को रिपोर्ट्स में सख्त पारदर्शिता की आवश्यक्ता है | जब तक डेटा सेंटर्स सही रिपोर्ट्स सामने नहीं लायेंगे तब तक इन लक्ष्यों को प्राप्त करना मुश्किल है |
एआई का प्रयोग दूसरे कार्यों के अलावा पर्यावरण के लिये भी किया जा सकता है | जैसे- खतरनाक मीथेन गैस लीक ढूँढने, ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने, मेडिकल रिसर्च, स्वास्थ्य सेवाओं में मदद, पानी के नए श्रोत ढूंडने और पानी बचाने के नए तरीके खोजने में किया जा सकता है | यूनिसेफ के थॉमस डेविन का कहना है कि AI शिक्षा व जलवायु समाधान में बड़ा बदलाव ला सकता है |

पानी की जरुरत सभी को है | हमें तकनीकी चमक के पीछे छुपे इस जल संकट को बड़ा व भयानक होने से पहले रोकना होगा | एआई का बढ़ता जलपद चिन्ह ( water footprint ) यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम विकास की बहुत बड़ी कीमत चुका रहे है ? कंपनियों को अपनी जल खपत की रिपोर्ट्स सार्वजनिक करनी चाहिए और हमे एक उपभोक्ता के रूप में जागरूक होना चाहिए | तकनीक का विकास पर्यावरण की बलि देकर नही होना चाहिए | तकनीक का असली उद्देश्य जीवन को सुगम बनाना है न कि प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करना | हमें इस तरह से कार्य करना होगा कि आने वाली पीढियाँ तकनीक के साथ प्राकृतिक संसाधनों का भी अच्छे से प्रयोग कर सकें | हमें सोचना होगा कि क्या हमारे एक चैट की कीमत एक गिलास साफ़ पानी तो नहीं |
ए आई के बारे में आपके क्या विचार है हमें कमेंट बॉक्स में बताएं |
तो आइये पानी बचाएं, पेड़ लगायें और हमारे पर्यावरण को साफ़ व स्वच्छ बनायें |
[डिस्क्लेमर : तकनीक में बदलाव और अलग – अलग डेटा सेंटर्स की कार्यप्रणाली के कारण इन आंकड़ों में भिन्नता हो सकती है | सटीक जानकारी के लिये कृपया मूल शोध पत्र या आधिकारिक रिपोर्ट्स का सन्दर्भ लें ]

बहुत बढ़िया रितु जी जो आप AI के बारे में सोचते हो
बहुत बढ़िया लेख है
Thanks you to Use Information Toward WI . It Helpful to Spread Awareness in Our Society.
Well said. More and more humans try to make life comfortable through technology in present time, more and more they’ll suffer in future.
Well written.
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